मध्यप्रदेश की भू -आकृति विविधता पूर्ण है । मध्यप्रदेश के उत्तर में यमुना का जलोढ़ मैदान है। पश्चिम में चंबल से लगीं अरावली की पर्वत श्रेणियां,पूर्व में छत्तीसगढ़ से लगा छोटा नागपुर का पठार, दक्षिण में ताप्ती के साथ लगे हुए प्रायद्वीप पठार हैं।और गंगा के किनारों की और बढ़ते बघेलखंड के पठार हैं, लेकिन हिमालय के संदर्भ में पठारो के उच्चावचन कम हैं।

सतपुड़ा के पठार इनमे सबसे, ऊंचे लगभग 1350 मीटर है।बघेलखण्ड के पठार 1152 मीटर,विंध्याचल श्रेणी की अधिकतम ऊंचाई 881 मीटर जबकि नर्मदा 200 मीटर, और चंबल 150 मीटर नीचे तक हैं।भौगोलिक स्थितियों के आधार पर मध्यप्रदेश को सात प्रमुख खंडो में बांटा जा सकता हैं- 

[1].मालवा का पठार
[2].मध्य भारत का पठार
 [3].बुदेलखंड का पठार
[4].रीवा और पन्ना का पठार
[5].बघेलखण्ड का पठार
[6].नर्मदा का पठार
[7].नर्मदा सोनभ्रंश घाटी
[8].सतपुड़ा- मैकल क्षेत्र
(1) मालवा का पठार- नाम के अनुरूप ही यह यह पाठार मालवा के अधिकांश भू: भाग पर विस्तारित है।
मध्यप्रदेश के लगभग सम्पूर्ण पश्चिम क्षेत्र में फैला हुआ यह पठार जो कि दक्कन ट्रेप चट्टानों द्वारा निर्मित हैं।जो नर्मदा के उत्तर से आरंभ होकर उत्तर में सीधे चंबल नदी तक फैला हुआ है।पूर्व में यह गंगा और नर्मदा घाटी को विभाजित करता हुआ सागर तक विस्तृत है।
ऊंचाई लगभग 300-500 मीटर के बीच हैं। यह पठार चंबल नर्मदा तथा बेतवा नदियों द्वारा अपवाहित हैं। राजधानी भोपाल नगर इस पठार के एक किनारे पर स्थित है। भोपाल अपने तालाबों के लिए विख्यात हैं।
इनमे बड़ा तालाब, छोटा तालाब, मोतिया तालाब, प्रमुख है।
इस पठार में ओसत वार्षिक वर्षा 900 मिलीमीटर से अधिक होती हैं। शीत ऋतु में तापमान बहुत कम ही 8 डिग्री से नीचे पहुंचता हैं। यद्यपि इस पठार के उत्तरी भाग में कोई वन नहीं है। दक्षिण भाग में जिसमें देवास, रायसेन, तथा होशंगाबाद समाविष्ट है सागौन के वन अच्छी मात्रा में है। विंध्य श्रेणियां नीमच सें लेकर पूर्व में सागर तक फैली हैं।



(2) मध्य भारत का पठार - यह  पाठर राज्य के मध्य भाग पर,चंबल क्षेत्र में स्थित हैं।
यह क्षेत्र चंबल नदी के निचले बेसिन में, इस राज्य के उत्तरी भाग को आवृत्त करता हैं। वह दक्षिण भाग में दक्कन ट्रैप के साथ विंध्य शैल समूहों द्वारा तथा पूर्वी भाग में बुदेलखण्ड नाईस शैलो द्वारा निर्मित हैं।
बूंदी तथा करुली पहाड़िया उसकी सीमा बनाती हैं।यह भाग निम्न एवम् उच्च भू: रचना का एक निराला क्षेत्र है।इस क्षेत्र में चंबल, काली सिंध,तथा पार्वती नदियों के गहरे बीहड़ हैं। यह पठार मात्र 200-300 मीटर ऊंचा हैं, यमुना नदी के निकट तथा उत्तर में उसकी ओसत ऊंचाई 150मीटर से कम है। ओसत वर्षा 750 मिलीमीटर से कम होती हैं। इस क्षेत्र में तापमान की विविधता है। ग्रीष्म ऋतु में 5-10 डिग्री सेल्सियस तक कम हो जाता हैं।
भिण्ड, मुरैना, ग्वालियर, तथा शिवपुरी, श्योरपुर जिले इस क्षेत्र में स्थित हैं।

(3) बुदेलखण्ड का पठार - यह पठार राज्य के बुदेलखण्ड के अधिकांश इलाक़े को अपने में समेटे हुए हैं। यह पठार मध्य भारत के पूर्व में स्थित हैं तथा उत्तर पूर्व में रीवा पन्ना पठार द्वारा परिबद्द हैं। इस क्षेत्र में आक्रियन काल के ग्रेनाइट शैल पाए जाते है, अधिकांशत: यह पठार सपाट हैं।
सीमांत क्षेत्र पर ढालू हैं।एवम् सामान्य भूरचना समतल और ऊंची नीची हैं। मैदानी भाग का उत्तरी एक तिहाई भाग एक रूप में समतल हैं। यह क्षेत्र बेतवा, धसान, केन तथा सिंध नदियां द्वारा अपवाहित होता हैं। वर्षा लगभग 750-1130 मि.मी. के बीच होती हैं। तथा तापमान 43 डिग्री सेल्सियस तथा 7.5 डिग्री के बीच होता हैं, इस क्षेत्र में दतिया, छतरपुर तथा टीकमगढ़ जिले समाविष्ट है।इस भू: भाग पर छतरपुर और टीकमगढ़ ज़िले में प्रसिद्ध चंदेला तालाबों की विस्तृत श्रृखला मौजूद हैं।

(4) रीवा तथा पन्ना का पठार - यह बुदेलखण्ड पठार के उत्तर पूर्व में स्थित है। इसे विंध्य पठार भी कहा जाता हैं।इस पठार की अधिकतम ऊंचाई 750 मीटर है। विंध्य शैल समूह की पहाड़ियों में तथा कैमूर श्रेणियों में 450 मीटर तक की ऊंचाई के कई जलप्रपात है।यह क्षेत्र सोनार,केन, बेयरमा तथा टोंस नदियों द्वारा अपवाहित होता हैं। वर्षा लगभग 1125-1250 मि.मी. के बीच होती हैं।इस भू खण्ड का तापमान 43.00 से 12.50से कम के बीच रहते हैं।इस क्षेत्र में घने वन हैं।खनिज संसाधनों की दृष्टि से भी यह क्षेत्र समृद्ध हैं। पन्ना में ही हीरा पाया जाता है।रीवा,पन्ना,सतना तथा दमोह जिले इस क्षेत्र में स्थित है। पन्ना में रियासत काल में बनाएं गए अनेक तालाब आज भी पन्ना नगर की जीवन रेखा बने हुए हैं।
इनमे प्रमुख हैं:-
बैनिसागर,धर्मसागर,निर्यत सागर, लोकपाल सागर,और महाराज सागर।

(5) बघेल खण्ड का पठार - यह पठार राज्य के बघेलखण्ड क्षेत्र के अधिकांश भू:भाग पर स्थित हैं।इस पठार का कुछ भाग छत्तीसगढ़ राज्य के तहत भी आता हैं। खनिज संसाधनों की दृष्टि से यह क्षेत्र राज्य का सर्वाधिक समृद्ध प्राकृतिक क्षेत्र हैं। उसमे छोटा नागपुर पठार के हिस्से भी सम्मिलित हैं।इस क्षेत्र में मुख्यत: जुरेसिक युग के शैल हैं,जबकि गोंडवाना शैल समूह इस क्षेत्र की भू- वैज्ञानिक विशेषता हैं। इस क्षेत्र में बहुत वन हैं। 
तथा शुष्क मानसून प्रकार के हैं।इस पठार की ऊंचाई लगभग 600 मीटर है, किन्तु उच्चतम चोटी लगभग 1500 मीटर हैं।यह क्षेत्र सोन, रेनुका, कान्हर तथा हसदेव नदियों द्वारा अपवाहित होता हैं। इस क्षेत्र में कोयला, बाक्साइड तथा चुना पत्थर की प्रचुरता हैं।इस क्षेत्र का बड़ा भाग छत्तीसगढ़ से बिलासपुर और सरगुजा जिलो में आता है। राज्य के शहडोल ज़िले का एक भाग आता हैं।

(6) नर्मदा सोन भ्रंश घाटी - यह इस राज्य की सबसे बड़ी घाटी है,जो 300मीटर ओसत ऊंचाई के साथ उत्तर पूर्व से पश्चिम की ओर फैली हुई हैं।यह उत्तर में विंध्य, तथा कैमूर पहाड़ियों द्वारा तथा दक्षिण में सतपुड़ा एवम् मैकल,तथा पूर्व में बघेल खण्ड उच्च भूमियों द्वारा परिबद्य हैं।घटिया सकरी हैं तथा ऊंचे- नीचे जलप्रपात होने के कारण अधिक नौकाचालन नहीं हो पाता हैं। यह क्षेत्र नर्मदा एवम् सोन नदियों द्वारा अपवाहित होता हैं।
नर्मदा घाटी में चूना पत्थर, अग्निश्य मिट्टी, मैगनीज, एवम् संगमरमर जबकि सोन घाटी में चूना पत्थर एवम् कोयले की खान है। इसमें जबलपुर, नरसिंहपुर, होशंगाबाद, खंडवा, खरगोन, तथा सिंधी जिले स्थित हैं।
इस घाटी के तहत आने वाले जबलपुर में तालाबो की विस्तृत श्रृंखला मौजूद हैं।

(7) सतपुड़ा मैकल क्षेत्र - नर्मदा घाटी के दक्षिण में स्थित इस क्षेत्र की ऊंचाई 600मीटर हैं। किंतु इसमें इस राज्य की उच्चतम चोटी धूपगढ़ भी स्थित हैं।यह क्षेत्र तवा, जोहीला, देनवा, ताप्ती, तथा वेनगंगा नदियों द्वारा अपवाहित होता हैं।
तापमान 39डिग्री, तथा 10 डिग्री सेल्सियस के बीच होता हैं। वर्षा भी लगभग 1250 मि.मी. के आसपास होती हैं।इस क्षेत्र में घने सागौन तथा मिश्रित वन हैं।यह क्षेत्र चूना पत्थर, डोलोमाइट, तथा तांबे जैसे खनिज संसाधनों से संपन्न हैं।इस क्षेत्र में छिंदवाड़ा, बैतूल, सिवनी, बालाघाट, मंडला, तथा खरगोन जिलों के कुछ भाग आते हैं।